इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण के लिए बड़ा झटका साबित किया है। सहारनपुर जातीय हिंसा से जुड़े वर्ष 2017 के चार आपराधिक मामलों में उन्हें राहत देने से हाईकोर्ट ने साफ इंकार कर दिया और सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसके बाद अब इन मामलों में ट्रायल आगे बढ़ना तय हो गया है। यह फैसला उत्तर प्रदेश की राजनीति, कानून-व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया के संतुलन पर नई बहस छेड़ रहा है।
मामला क्या है?
साल 2017 में सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा के दौरान कई जगहों पर तनाव, तोड़फोड़ और उकसावे की घटनाएं सामने आई थीं। इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग थानों में चार अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं, जिनमें चंद्रशेखर आज़ाद का नाम भी आरोपियों में शामिल किया गया था। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने सभी मामलों में चार्जशीट दाखिल की, जिसके विरुद्ध चंद्रशेखर पक्ष ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
चंद्रशेखर आज़ाद की ओर से दलील दी गई कि ये चारों एफआईआर एक ही घटनाक्रम से जुड़ी हैं और एक ही व्यक्ति के खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज करना कानून की भावना के विपरीत है। साथ ही इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई, यह कहते हुए कि इन केसों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि चारों एफआईआर अलग-अलग स्थानों, अलग-अलग समय और अलग-अलग शिकायतकर्ताओं से संबंधित हैं। सरकार का तर्क था कि ये किसी एक ही घटना का हिस्सा नहीं, बल्कि हिंसा और उकसावे की अलग-अलग घटनाएं हैं, जिनका स्वतंत्र आपराधिक चरित्र है।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के साथ केस डायरी और चार्जशीट का अवलोकन करने के बाद पाया कि इन मामलों में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं बन रहा। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि इस स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं है और कानून के अनुसार ट्रायल को आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए, इसलिए चंद्रशेखर आज़ाद की याचिकाएं खारिज की जाती हैं।
राजनीतिक मायने और सियासी हलचल
इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में नई हलचल पैदा हो गई है। सत्तारूढ़ पक्ष इसे योगी सरकार की कथित ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति को न्यायिक समर्थन के रूप में पेश कर रहा है, यह संदेश देते हुए कि कानून-व्यवस्था के मामले में सरकार किसी भी दबाव में नहीं झुकेगी।
विपक्ष दूसरी ओर इस पूरी कार्रवाई को राजनीतिक चश्मे से देखकर इसे दलित राजनीति और उभरते नेतृत्व पर अंकुश लगाने की कोशिश बता रहा है। कई विपक्षी नेता इसे असहमति की आवाज़ों पर दबाव बढ़ाने की रणनीति करार दे रहे हैं, हालांकि अदालत के आदेश में कहीं भी ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ वाली दलील को स्वीकार नहीं किया गया है।
कानूनी पहलू और आगे की स्थिति
कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश किसी नई गिरफ्तारी का सीधा निर्देश नहीं देता, लेकिन ट्रायल कोर्ट और पुलिस के लिए आगे की कार्रवाई का रास्ता और अधिक साफ जरूर करता है। जहां-जहां चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, उन मामलों में अब सुनवाई तेज होने की पूरी संभावना है और अभियोजन पक्ष अपने सबूतों के आधार पर मामला आगे बढ़ा सकेगा।
यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है कि अदालतें राजनीतिक बहस या भावनात्मक तर्कों के बजाय सबूतों और कानून की कसौटी पर ही निर्णय लेती हैं। साथ ही, यह सवाल भी फिर से जोर पकड़ रहा है कि क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है और क्या जनप्रतिनिधि या राजनीतिक पहचान न्यायिक प्रक्रिया से किसी प्रकार की विशेष छूट दिला सकती है या नहीं।